सरगुजा में मिट्टी जांच के नाम पर बड़ा फर्जीवाड़ा! बिना सैंपल लिए जारी हो रहे सॉयल हेल्थ कार्ड, किसानों को नहीं मिल रहा लाभ
सरगुजा। किसानों को वैज्ञानिक तरीके से खेती करने में मदद देने के उद्देश्य से शुरू की गई सॉयल हेल्थ कार्ड योजना पर सवाल खड़े हो गए हैं। सरगुजा जिले में मिट्टी जांच के नाम पर कथित लापरवाही और फर्जीवाड़े का मामला सामने आया है। आरोप है कि कई किसानों के खेतों से मिट्टी का नमूना लिए बिना ही उनके नाम से सॉयल हेल्थ कार्ड जारी कर दिए गए।
किसानों का कहना है कि कई वर्षों से उनके खेतों से मिट्टी का सैंपल नहीं लिया गया, लेकिन इसके बावजूद उन्हें जांच रिपोर्ट उपलब्ध करा दी गई। कुछ मामलों में पुराने सैंपल की रिपोर्ट को ही दोबारा इस्तेमाल किए जाने की बात भी सामने आई है।
किसानों को नहीं मिल रही सही जानकारी
सॉयल हेल्थ कार्ड का उद्देश्य किसानों को उनके खेत की मिट्टी की गुणवत्ता, पोषक तत्वों की स्थिति और फसल के अनुसार खाद एवं उर्वरक की सही मात्रा की जानकारी देना है। लेकिन यदि जांच रिपोर्ट वास्तविक मिट्टी के आधार पर तैयार नहीं हुई है तो किसान सही निर्णय नहीं ले पा रहे हैं।
किसानों का कहना है कि उन्हें यह जानकारी नहीं मिल पा रही कि खेत में कौन-सी खाद कितनी मात्रा में डालनी चाहिए, जिससे उत्पादन बढ़ सके और अनावश्यक खर्च से बचा जा सके।
सरकारी योजना पर उठे सवाल
मिट्टी जांच और सॉयल हेल्थ कार्ड वितरण के लिए सरकार की ओर से लाखों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। इस योजना का उद्देश्य खेती की लागत कम करना और मिट्टी की उर्वरता बनाए रखना है। लेकिन सरगुजा में सामने आए मामलों ने पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
किसानों ने बताई जांच में गड़बड़ी
जांच के दौरान कई किसानों ने बताया कि लंबे समय से उनके खेतों से मिट्टी का कोई नमूना नहीं लिया गया। इसके बाद भी उनके नाम पर रिपोर्ट तैयार कर कार्ड जारी कर दिए गए। किसानों ने पूरे मामले की जांच कर दोषी लोगों पर कार्रवाई की मांग की है।
प्रशासन के सामने चुनौती
अब सवाल यह है कि बिना मिट्टी जांच के तैयार किए गए सॉयल हेल्थ कार्ड कितने सही हैं और किसानों को इसका वास्तविक लाभ कब मिलेगा। कृषि विभाग की जिम्मेदारी है कि वह पूरे मामले की जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाए और किसानों को सही जानकारी उपलब्ध कराए।
अगर मिट्टी जांच व्यवस्था में सुधार नहीं किया गया तो सरकारी योजनाओं का लाभ कागजों तक सीमित रह जाएगा और किसान वैज्ञानिक खेती के फायदे से वंचित रह जाएंगे।

