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नेपाल में 2,000 फीट चौड़े ग्लेशियर के टूटने से आई जानलेवा बाढ़, जानिए कैसे मची तबाही

Admin

 

2,000 फीट चौड़े ग्लेशियर ने कैसे नेपाल में मचाई जानलेवा बाढ़? 4,000 फीट की ऊंचाई से गिरा बर्फ का विशाल हिस्सा



हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों का टूटना कोई असामान्य प्राकृतिक प्रक्रिया नहीं है, लेकिन जब हजारों टन बर्फ और चट्टान एक साथ ऊंचाई से नीचे गिरते हैं, तो इसका असर बेहद विनाशकारी हो सकता है। नेपाल में सामने आई एक ऐसी ही घटना ने वैज्ञानिकों और स्थानीय प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है। शुरुआती रिपोर्टों के अनुसार करीब 2,000 फीट यानी लगभग 610 मीटर चौड़ा ग्लेशियर का विशाल हिस्सा टूटकर नीचे गिरा और इस घटना ने नदी घाटी में अचानक पानी और मलबे का तेज बहाव पैदा कर दिया।

यह घटना इस बात का उदाहरण है कि हिमालय में बदलती जलवायु, ग्लेशियरों की अस्थिरता और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बढ़ते प्राकृतिक खतरे किस तरह नीचे बसे इलाकों के लिए अचानक बड़ी मुसीबत बन सकते हैं।

आखिर हुआ क्या था?

घटना की शुरुआत हिमालय के ऊंचे हिस्से में एक विशाल बर्फीले द्रव्यमान के टूटने से हुई। शुरुआती वैज्ञानिक आकलन के अनुसार ग्लेशियर का लगभग 2,000 फीट चौड़ा हिस्सा अचानक अलग हुआ और लगभग 4,000 फीट की ऊंचाई से नीचे गिर गया।

इतने बड़े बर्फीले हिस्से के अचानक गिरने से केवल बर्फ ही नीचे नहीं आई। उसके साथ ग्लेशियर के आसपास मौजूद चट्टान, मिट्टी, पत्थर और अन्य मलबा भी तेजी से नीचे की ओर बढ़ा। जब यह भारी द्रव्यमान नदी घाटी तक पहुंचा, तो पानी और मलबे की गति अचानक बहुत बढ़ गई।

इसी तरह की घटनाएं कुछ ही मिनटों में सामान्य नदी को बेहद खतरनाक मलबा-बहाव वाली धारा में बदल सकती हैं।

2,000 फीट चौड़ा बर्फ का टुकड़ा इतना खतरनाक क्यों था?

किसी ग्लेशियर का 2,000 फीट चौड़ा हिस्सा सुनने में सिर्फ एक आकार जैसा लग सकता है, लेकिन वास्तविकता में यह बहुत बड़ा द्रव्यमान होता है।

कल्पना कीजिए कि सैकड़ों मीटर चौड़ा बर्फ का विशाल हिस्सा पहाड़ की ऊंचाई से अचानक नीचे गिर रहा है। गिरते समय गुरुत्वाकर्षण के कारण इसकी गति तेजी से बढ़ती है। नीचे पहुंचने पर इसकी ऊर्जा आसपास के बर्फ, चट्टान और मिट्टी को भी अपनी चपेट में ले सकती है।

यही वजह है कि ऐसी घटनाओं को केवल "बर्फ गिरना" कहना सही नहीं होगा। यह एक तरह की Ice Avalanche यानी बर्फीली हिमस्खलन घटना बन सकती है, जो आगे जाकर अचानक बाढ़ और मलबे के तेज बहाव का कारण बनती है।

4,000 फीट की ऊंचाई से गिरने का क्या असर हुआ?

ऊंचाई इस घटना को और अधिक खतरनाक बनाती है।

जब कोई विशाल बर्फीला द्रव्यमान हजारों फीट की ऊंचाई से नीचे गिरता है, तो उसमें भारी गतिज ऊर्जा पैदा होती है। नीचे पहुंचने पर यह ऊर्जा आसपास की बर्फ और चट्टानों को तोड़ सकती है।

अगर नीचे नदी या ग्लेशियर से बनी झील मौजूद हो, तो गिरता हुआ मलबा उसमें अचानक भारी मात्रा में पानी विस्थापित कर सकता है। इसके परिणामस्वरूप पानी की बड़ी लहर पैदा हो सकती है।

यह लहर नदी के बहाव की दिशा में तेजी से आगे बढ़ती है और रास्ते में आने वाली मिट्टी, पत्थर, पेड़ और अन्य सामग्री को भी अपने साथ ले जाती है।

इसी कारण पहाड़ी इलाकों में अचानक आने वाली ऐसी बाढ़ सामान्य बारिश से पैदा होने वाली बाढ़ की तुलना में कहीं ज्यादा विनाशकारी हो सकती है।

क्या यह Glacial Lake Outburst Flood यानी GLOF था?

ऐसी घटनाओं की चर्चा में Glacial Lake Outburst Flood यानी GLOF का नाम अक्सर सामने आता है।

ग्लेशियरों के पीछे हटने से पहाड़ों में कई झीलें बनती हैं। इन झीलों को ग्लेशियल झील कहा जाता है। इनके चारों ओर अक्सर बर्फ, मिट्टी और पत्थरों से बनी प्राकृतिक दीवार होती है।

अगर किसी ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा अचानक झील में गिर जाए, तो पानी तेजी से विस्थापित हो सकता है। प्राकृतिक बांध कमजोर हो तो झील का पानी भी अचानक बाहर निकल सकता है और नीचे की ओर बेहद तेज बाढ़ आ सकती है।

हालांकि नेपाल की इस ताजा घटना को सीधे GLOF कहना तभी उचित होगा जब वैज्ञानिक जांच यह पुष्टि करे कि किसी ग्लेशियल झील के अचानक फटने से बाढ़ पैदा हुई थी। शुरुआती जानकारी में ग्लेशियर के बड़े हिस्से के टूटने और उसके प्रभाव को प्रमुख कारण के रूप में देखा जा रहा है।

हिमालय में ग्लेशियर क्यों अस्थिर हो रहे हैं?

हिमालय दुनिया के सबसे संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में से एक है। यहां ग्लेशियर तापमान और वर्षा में होने वाले बदलावों से प्रभावित होते हैं।

वैज्ञानिक अध्ययनों में लंबे समय से यह देखा गया है कि हिमालय के कई ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं। तापमान बढ़ने के कारण बर्फ का संतुलन बदलता है और कई ग्लेशियरों में पिघलने की दर बढ़ सकती है।

ग्लेशियर के पीछे हटने से उसके आसपास खाली जगह बन सकती है। वहां पानी जमा होकर नई झील बना सकता है या मौजूदा झील का आकार बढ़ सकता है।

इसके अलावा बर्फ के नीचे और आसपास मौजूद चट्टानों की स्थिरता भी प्रभावित हो सकती है।

इसका मतलब यह नहीं है कि हर ग्लेशियर तुरंत टूट जाएगा, लेकिन बदलती परिस्थितियां कुछ क्षेत्रों में प्राकृतिक जोखिम को बढ़ा सकती हैं।

सिर्फ पानी नहीं, मलबा भी बनता है सबसे बड़ा खतरा

फ्लैश फ्लड को खतरनाक बनाने वाली एक बड़ी वजह सिर्फ पानी नहीं है।

जब बर्फ और चट्टान पहाड़ से नीचे गिरते हैं, तो वे अपने रास्ते में मिट्टी, बड़े पत्थर और पेड़ तक अपने साथ बहा सकते हैं। इससे पानी एक तरह के debris flow में बदल सकता है।

ऐसा बहाव सामान्य पानी से कई गुना ज्यादा नुकसान कर सकता है क्योंकि इसमें भारी पत्थर और चट्टान भी तेजी से आगे बढ़ते हैं।

घरों, पुलों, सड़कों और बिजली के ढांचे के लिए यह बेहद खतरनाक स्थिति होती है।

पहाड़ों में रहने वाले लोगों को सबसे ज्यादा खतरा

ऐसी घटनाओं का सबसे बड़ा खतरा उन लोगों को होता है जो नदी घाटियों और पहाड़ों की निचली ढलानों पर रहते हैं।

ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों में किसी घटना के शुरू होने और नीचे बाढ़ पहुंचने के बीच समय बहुत कम हो सकता है। अगर घटना रात में हो या मौसम खराब हो, तो खतरा और बढ़ जाता है।

कई बार स्थानीय लोगों को यह समझने का मौका भी नहीं मिलता कि ऊपर पहाड़ों में क्या हुआ है।

इसलिए केवल राहत और बचाव पर निर्भर रहने के बजाय Early Warning System यानी पूर्व चेतावनी प्रणाली बेहद जरूरी है।

वैज्ञानिकों के लिए यह घटना क्यों महत्वपूर्ण है?

ग्लेशियर से जुड़ी ऐसी घटनाएं वैज्ञानिकों को हिमालय में बदल रहे प्राकृतिक सिस्टम को समझने में मदद करती हैं।

उपग्रह तस्वीरों, ड्रोन, मौसम स्टेशन और ग्लेशियर मॉनिटरिंग सिस्टम के जरिए वैज्ञानिक यह पता लगाने की कोशिश करते हैं कि:

  • ग्लेशियर कितनी तेजी से पीछे हट रहा है?

  • बर्फ की मोटाई कितनी बदल रही है?

  • नई ग्लेशियल झीलें कहां बन रही हैं?

  • कौन-सी झीलें ज्यादा जोखिम वाली हैं?

  • पहाड़ की ढलान कितनी स्थिर है?

  • किसी संभावित हिमस्खलन के बाद बाढ़ कितनी तेजी से नीचे पहुंच सकती है?

इन सवालों के जवाब भविष्य में ऐसे क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए चेतावनी प्रणाली तैयार करने में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

नेपाल के लिए यह नई चुनौती नहीं

नेपाल का बड़ा हिस्सा हिमालय में स्थित है और देश में पहले भी ग्लेशियर तथा ग्लेशियल झीलों से जुड़ी बाढ़ की घटनाएं सामने आती रही हैं।

देश के कई दूरदराज के इलाकों में सड़क और संचार व्यवस्था सीमित होने के कारण प्राकृतिक आपदा के दौरान राहत पहुंचाना भी चुनौतीपूर्ण होता है।

ऐसे में अगर ऊपर पहाड़ों में अचानक बर्फ या चट्टान का बड़ा हिस्सा टूटता है, तो नीचे के गांवों और बस्तियों तक खतरा पहुंचने से पहले पर्याप्त समय में चेतावनी देना बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।

क्या जलवायु परिवर्तन इसका कारण है?

जलवायु परिवर्तन और ग्लेशियरों के पीछे हटने के बीच संबंध वैज्ञानिक रूप से अच्छी तरह स्थापित है। हिमालय में बढ़ता तापमान ग्लेशियरों के द्रव्यमान और उनकी संरचना को प्रभावित कर सकता है।

लेकिन किसी एक विशेष बाढ़ या ग्लेशियर टूटने की घटना को केवल जलवायु परिवर्तन के कारण हुआ बताना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा, जब तक उस घटना का विस्तृत अध्ययन न हो।

किसी घटना में कई कारक एक साथ भूमिका निभा सकते हैं—जैसे तापमान, बारिश, बर्फ की स्थिति, पहाड़ की ढलान, चट्टानों की कमजोरी और ग्लेशियल झीलों की स्थिति।

इसलिए वैज्ञानिक आम तौर पर घटना के बाद उपग्रह डेटा, स्थल निरीक्षण और मौसम संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण करते हैं।

भविष्य में खतरा कैसे कम किया जा सकता है?

हिमालयी क्षेत्रों में ऐसे खतरों को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन नुकसान को काफी कम किया जा सकता है।

इसके लिए कई कदम जरूरी हैं:

1. ग्लेशियरों की लगातार निगरानी
उपग्रह और जमीन पर लगे उपकरणों से ग्लेशियरों में हो रहे बदलावों पर नजर रखी जा सकती है।

2. ग्लेशियल झीलों की निगरानी
जिन झीलों का आकार तेजी से बढ़ रहा है या जिनके प्राकृतिक बांध कमजोर हैं, उन्हें प्राथमिकता से मॉनिटर करना जरूरी है।

3. Early Warning System
नदी घाटियों में सेंसर और अलार्म सिस्टम लगाए जा सकते हैं ताकि अचानक पानी बढ़ने पर नीचे रहने वाले लोगों को तुरंत चेतावनी मिल सके।

4. जोखिम वाले क्षेत्रों का नक्शा
कौन से गांव, सड़कें और पुल संभावित बाढ़ की चपेट में आ सकते हैं, इसकी पहले से मैपिंग की जानी चाहिए।

5. स्थानीय लोगों को प्रशिक्षण
लोगों को यह पता होना चाहिए कि अचानक नदी का पानी बढ़ने, असामान्य आवाज आने या पहाड़ से मलबा आने की स्थिति में किस दिशा में जाना है।

एक ग्लेशियर की घटना से मिली बड़ी चेतावनी

नेपाल की यह घटना केवल एक प्राकृतिक आपदा की कहानी नहीं है। यह हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते प्राकृतिक जोखिमों की ओर भी संकेत करती है।

करीब 2,000 फीट चौड़े ग्लेशियर हिस्से का टूटना और हजारों फीट नीचे गिरना यह दिखाता है कि ऊंचे पहाड़ों में होने वाली छोटी दिखने वाली घटनाएं नीचे घाटियों में कितनी बड़ी तबाही का रूप ले सकती हैं।

जब बर्फ, पानी, चट्टान और मलबा एक साथ तेज गति से नीचे आते हैं, तो नदी का सामान्य बहाव कुछ ही समय में जानलेवा फ्लैश फ्लड में बदल सकता है।

इसीलिए हिमालय में विकास के साथ-साथ आपदा प्रबंधन और वैज्ञानिक निगरानी को भी उतना ही महत्व देना होगा।

निष्कर्ष: नेपाल में आई इस जानलेवा बाढ़ के पीछे शुरुआती आकलन में लगभग 2,000 फीट चौड़े ग्लेशियर के हिस्से के टूटने और करीब 4,000 फीट नीचे गिरने की घटना को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसने बर्फ, पानी, चट्टान और मलबे को तेजी से नीचे की ओर धकेला, जिससे अचानक बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हुई। घटना की पूरी वैज्ञानिक वजह और बाढ़ की सटीक श्रृंखला की पुष्टि विस्तृत जांच के बाद ही हो सकेगी।

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