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रायपुर में जुटे लोकतंत्र के सेनानी, सीएम विष्णुदेव साय और डॉ. रमन सिंह ने आपातकाल के संघर्षों को किया याद

Admin


Ambikapur। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर एक बार फिर लोकतांत्रिक इतिहास की यादों और संघर्षों की गूंज से भर गई, जब यहां लोकतंत्र सेनानियों का भव्य सम्मान समारोह आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और विधानसभा अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह विशेष रूप से उपस्थित रहे। दोनों नेताओं ने 1975–77 के आपातकाल के दौर को याद करते हुए इसे भारतीय लोकतंत्र का सबसे कठिन और निर्णायक समय बताया।

कार्यक्रम में बड़ी संख्या में वे लोग शामिल हुए जिन्होंने आपातकाल के दौरान लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष किया, जेल यात्रा की, और कई प्रकार की कठिनाइयों का सामना किया। मंच पर जब लोकतंत्र सेनानियों को सम्मानित किया गया तो पूरा सभागार तालियों से गूंज उठा और उस ऐतिहासिक संघर्ष को याद कर माहौल भावुक हो गया।

आपातकाल की यादें और लोकतंत्र का संघर्ष

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने अपने संबोधन में कहा कि आपातकाल का दौर भारतीय इतिहास में एक ऐसा समय था जब संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों को स्थगित कर दिया गया था। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, प्रेस की आजादी और राजनीतिक गतिविधियों पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए थे। ऐसे कठिन समय में भी हजारों लोकतंत्र सेनानियों ने साहस दिखाते हुए लोकतंत्र की रक्षा की।

उन्होंने कहा कि “लोकतंत्र केवल एक शासन प्रणाली नहीं, बल्कि देश की आत्मा है। इसकी रक्षा के लिए नागरिकों का जागरूक और सजग होना आवश्यक है।” मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि आज की पीढ़ी को उन संघर्षों की जानकारी होना जरूरी है, ताकि वे लोकतांत्रिक मूल्यों को हल्के में न लें।

डॉ. रमन सिंह का संबोधन

डॉ. रमन सिंह ने अपने वक्तव्य में कहा कि आपातकाल के समय देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लगभग समाप्त कर दी गई थी। उस दौर में राजनीतिक विरोधियों, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया गया था। इसके बावजूद लोकतंत्र सेनानियों ने हार नहीं मानी और देश में लोकतंत्र की लौ जलाए रखी।

उन्होंने कहा कि यह संघर्ष केवल एक राजनीतिक लड़ाई नहीं था, बल्कि भारत की संवैधानिक व्यवस्था को बचाने का आंदोलन था। डॉ. सिंह ने युवाओं से आह्वान किया कि वे इतिहास को पढ़ें और समझें, ताकि भविष्य में लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा कर सकें।

सम्मान समारोह में भावुक क्षण

कार्यक्रम के दौरान लोकतंत्र सेनानियों को शॉल, श्रीफल और स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। कई सेनानी अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए भावुक हो गए। मंच पर मौजूद नेताओं ने भी उनके योगदान को नमन करते हुए कहा कि देश की आजादी के बाद लोकतंत्र को मजबूत करने में इन सेनानियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है।

सभागार में उपस्थित लोगों ने उन कठिन दिनों को याद किया जब लोकतंत्र को बचाने के लिए कई परिवारों ने त्याग और बलिदान झेला था। कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने एक स्वर में लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का संकल्प लिया।

लोकतंत्र की वर्तमान प्रासंगिकता

वक्ताओं ने यह भी कहा कि आज का भारत तेजी से विकास कर रहा है, लेकिन लोकतंत्र की मजबूती के लिए नागरिकों की जिम्मेदारी पहले से अधिक बढ़ गई है। उन्होंने कहा कि संविधान केवल किताब नहीं है, बल्कि यह देश की दिशा और दशा तय करने वाला दस्तावेज है।

मुख्यमंत्री और विधानसभा अध्यक्ष दोनों ने इस बात पर जोर दिया कि लोकतंत्र की मजबूती तभी संभव है जब नागरिक अपने अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों का भी ईमानदारी से पालन करें।

समापन और संदेश

कार्यक्रम का समापन लोकतंत्र सेनानियों के सम्मान और उनके योगदान को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के संकल्प के साथ हुआ। सभी उपस्थित लोगों ने इस बात पर सहमति जताई कि आपातकाल जैसे कठिन दौर की यादें आने वाली पीढ़ियों को हमेशा लोकतंत्र के महत्व का एहसास कराती रहेंगी।

रायपुर में आयोजित यह समारोह न केवल सम्मान का अवसर था, बल्कि लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करने का एक भावनात्मक और ऐतिहासिक क्षण भी बन गया। 

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