El Niño Alert: क्या अब नहीं होगी बारिश? बेहद अहम हैं आने वाले दिन, अल नीनो के खतरनाक प्रभाव को लेकर बड़ा अलर्ट
अल नीनो (El Niño) को लेकर दुनिया भर के मौसम वैज्ञानिक लगातार निगरानी बनाए हुए हैं। प्रशांत महासागर में समुद्री सतह के तापमान में हो रहे बदलाव ने एक बार फिर इस जलवायु प्रणाली को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए यह खबर बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश की अर्थव्यवस्था, खेती, जल संसाधन और करोड़ों लोगों का जीवन मानसून पर निर्भर करता है।
हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर यह सवाल तेजी से वायरल हो रहा है कि क्या अब भारत में बारिश नहीं होगी? क्या इस साल अल नीनो के कारण सूखे जैसी स्थिति बन सकती है? इन सवालों को लेकर लोगों में भ्रम भी है और चिंता भी। हालांकि मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन आने वाले सप्ताह निश्चित रूप से बेहद अहम होंगे। इन्हीं दिनों में यह साफ होगा कि अल नीनो कितना प्रभावी होगा और भारतीय मानसून पर इसका कितना असर पड़ेगा।
क्या होता है अल नीनो?
अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जो तब बनती है जब मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर के पानी का तापमान सामान्य से अधिक बढ़ जाता है। समुद्र का यह बढ़ा हुआ तापमान दुनिया भर के वायुमंडलीय दबाव और हवाओं के पैटर्न को प्रभावित करता है। इसका असर केवल एशिया ही नहीं बल्कि अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका और यूरोप तक देखने को मिलता है।
भारत में अल नीनो का सबसे बड़ा असर दक्षिण-पश्चिम मानसून पर पड़ता है। सामान्य परिस्थितियों में मानसूनी हवाएं अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से भरपूर नमी लेकर देशभर में बारिश कराती हैं। लेकिन अल नीनो बनने पर इन हवाओं की ताकत और दिशा प्रभावित हो सकती है, जिससे कई इलाकों में बारिश कम हो जाती है।
क्या अब भारत में बारिश नहीं होगी?
इस सवाल का जवाब है—बिल्कुल नहीं।
अल नीनो का मतलब यह नहीं है कि पूरे देश में बारिश पूरी तरह बंद हो जाएगी। इसका प्रभाव मुख्य रूप से बारिश के वितरण पर पड़ता है। कुछ राज्यों में सामान्य से कम वर्षा हो सकती है, जबकि कुछ क्षेत्रों में अचानक भारी बारिश और बाढ़ जैसी स्थिति भी बन सकती है।
यानी अल नीनो बारिश को पूरी तरह खत्म नहीं करता, बल्कि मानसून के पैटर्न को बदल देता है। यही वजह है कि कुछ जिलों में सूखे जैसी स्थिति बनती है तो कुछ इलाकों में सामान्य से अधिक बारिश भी दर्ज की जाती है।
क्यों बेहद महत्वपूर्ण हैं आने वाले दिन?
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार जुलाई के अंत और अगस्त की शुरुआत मानसून के लिए निर्णायक मानी जाती है। इसी दौरान समुद्र की सतह का तापमान, हवाओं की दिशा, बादलों की गतिविधि और वायुमंडलीय दबाव का विश्लेषण कर यह अनुमान लगाया जाता है कि मानसून आगे कैसा रहेगा।
यदि अल नीनो मजबूत होता है तो अगस्त और सितंबर में बारिश सामान्य से कम हो सकती है। लेकिन यदि अन्य मौसम प्रणालियां सक्रिय रहती हैं तो अल नीनो का असर काफी हद तक कम भी हो सकता है।
भारत के किन राज्यों पर पड़ सकता है असर?
यदि अल नीनो का प्रभाव बढ़ता है तो मध्य भारत, उत्तर-पश्चिम भारत और कुछ दक्षिणी राज्यों में सामान्य से कम बारिश की संभावना बढ़ सकती है। वहीं पूर्वोत्तर भारत और कुछ तटीय क्षेत्रों में स्थिति अलग हो सकती है।
हालांकि यह प्रभाव पूरे देश में समान नहीं होता। हर राज्य और हर क्षेत्र की स्थिति स्थानीय मौसम प्रणालियों पर भी निर्भर करती है।
खेती पर पड़ सकता है सबसे बड़ा प्रभाव
भारत में खरीफ फसलों की खेती मानसून पर निर्भर रहती है। धान, मक्का, सोयाबीन, कपास, दालें और कई अन्य फसलों की बुवाई समय पर और पर्याप्त बारिश से जुड़ी होती है।
यदि लंबे समय तक बारिश कम रहती है तो फसलों की वृद्धि प्रभावित हो सकती है। सिंचाई की जरूरत बढ़ सकती है और किसानों की लागत भी बढ़ सकती है। इससे उत्पादन कम होने की आशंका रहती है।
जल संकट और बिजली उत्पादन पर असर
कम बारिश का असर केवल खेती तक सीमित नहीं रहता। देश के बड़े बांधों और जलाशयों में पानी का स्तर भी प्रभावित हो सकता है। यदि जलाशयों में पर्याप्त पानी नहीं पहुंचता तो पेयजल संकट और जलविद्युत उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है।
कई शहरों और ग्रामीण इलाकों में पानी की उपलब्धता प्रभावित होने की संभावना रहती है।
महंगाई भी बढ़ सकती है
यदि बारिश सामान्य से कम रहती है और कृषि उत्पादन प्रभावित होता है तो इसका सीधा असर बाजार पर दिखाई देता है। सब्जियों, दालों, अनाज और अन्य खाद्य पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है।
इसी कारण सरकार और मौसम एजेंसियां अल नीनो की स्थिति पर लगातार नजर रखती हैं ताकि समय रहते आवश्यक कदम उठाए जा सकें।
क्या पूरे भारत में सूखा पड़ जाएगा?
विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
भारत का मौसम केवल अल नीनो से प्रभावित नहीं होता। हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD), बंगाल की खाड़ी में बनने वाले कम दबाव के क्षेत्र, अरब सागर की गतिविधियां और पश्चिमी विक्षोभ जैसी कई अन्य मौसम प्रणालियां भी मानसून को प्रभावित करती हैं।
कई वर्षों में देखा गया है कि अल नीनो की स्थिति होने के बावजूद भारत के कई हिस्सों में सामान्य या उससे अधिक बारिश हुई है।
मौसम विभाग की क्या है सलाह?
भारतीय मौसम विभाग (IMD) लगातार मानसून और अल नीनो की गतिविधियों पर नजर बनाए हुए है। विशेषज्ञों की सलाह है कि किसान मौसम विभाग के पूर्वानुमानों के अनुसार खेती से जुड़े निर्णय लें।
आम लोगों को भी मौसम संबंधी अफवाहों से बचना चाहिए और केवल आधिकारिक अपडेट पर ही भरोसा करना चाहिए।
आने वाले दिनों में क्या हो सकता है?
विशेषज्ञों के अनुसार यदि अल नीनो और मजबूत होता है तो मानसून के अंतिम चरण में बारिश की मात्रा प्रभावित हो सकती है। कुछ राज्यों में बारिश का लंबा ब्रेक देखने को मिल सकता है, जबकि कुछ इलाकों में अचानक भारी बारिश भी हो सकती है।
यानी आने वाले सप्ताह मौसम के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण रहने वाले हैं।
अल नीनो को लेकर चिंता जरूर बढ़ी है, लेकिन फिलहाल यह कहना सही नहीं होगा कि भारत में अब बारिश नहीं होगी। मानसून अभी भी सक्रिय है और कई अन्य मौसम प्रणालियां भी इसके साथ काम कर रही हैं। हालांकि वैज्ञानिकों की नजर अगले कुछ हफ्तों पर टिकी हुई है, क्योंकि यही समय तय करेगा कि अल नीनो भारत के मानसून को कितना प्रभावित करेगा।
फिलहाल लोगों को घबराने के बजाय मौसम विभाग के आधिकारिक पूर्वानुमानों पर भरोसा करना चाहिए। किसानों को स्थानीय कृषि सलाह का पालन करना चाहिए और प्रशासन द्वारा जारी मौसम चेतावनियों पर ध्यान देना चाहिए। आने वाले दिन मानसून के लिए बेहद अहम हैं और इन्हीं दिनों में यह साफ होगा कि इस साल अल नीनो कितना असर दिखाता है।

